Pages

Wednesday, March 18, 2026

पल

सिकुड़ता ठिठुरता, जलता जलाता पल,
गहरा सा एक ज़ख्म दे जाता पल,
शाम की अंगड़ाई में जब दिन ढल जाए
किसी अपने की गोद में सुकून का पल।

पहले भी यहीं था, अब भी यहीं है,
न जाने तुम क्यों भटकते ढूंढते रहे उसे,
धैर्य और श्रद्धा से अगर करते ख्वाहिश
तो अपने ही अंदर मिल जाता वही पल।