सिकुड़ता ठिठुरता, जलता जलाता पल,
गहरा
सा एक ज़ख्म दे जाता पल,
शाम
की अंगड़ाई में जब दिन ढल जाए
किसी
अपने की गोद में सुकून का पल।
न जाने तुम क्यों भटकते ढूंढते रहे उसे,
धैर्य और श्रद्धा से अगर करते ख्वाहिश
तो अपने ही अंदर मिल जाता वही पल।
Thinking has no boundaries......